उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा राज्य है और हर वर्ष लाखों छात्र NEET-UG परीक्षा में शामिल होते हैं। मेडिकल सीटों की संख्या भी सबसे अधिक राज्यों में शामिल है, लेकिन इसके बावजूद उत्तर प्रदेश के हजारों योग्य छात्रों को अपने ही राज्य में MBBS और BDS की सीट नहीं मिल पाती। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण वर्तमान प्रवेश नीति को माना जा रहा है।
देश के अधिकांश राज्यों में State Quota की मेडिकल सीटें पहले और दूसरे राउंड तक केवल उसी राज्य के डोमिसाइल (स्थायी निवासी) छात्रों के लिए आरक्षित रहती हैं। तीसरे राउंड (Round-3) या स्ट्रे वैकेंसी राउंड में ही बाहरी राज्यों के छात्रों को आवेदन का अवसर मिलता है। इससे पहले स्थानीय छात्रों को अपने राज्य में पर्याप्त अवसर मिल जाता है।
लेकिन उत्तर प्रदेश में स्थिति अलग है। यहां निजी मेडिकल एवं डेंटल कॉलेजों की State Quota सीटों पर पहले ही राउंड से पूरे देश के अभ्यर्थी आवेदन कर सकते हैं। परिणामस्वरूप देशभर से बड़ी संख्या में आवेदन आते हैं, प्रतिस्पर्धा कई गुना बढ़ जाती है और उत्तर प्रदेश के छात्रों के लिए अपने ही राज्य में सीट प्राप्त करना कठिन हो जाता है।
यही सबसे बड़ा सवाल है
यदि अधिकांश राज्य अपने छात्रों को पहले और दूसरे राउंड में प्राथमिकता देते हैं और तीसरे राउंड से ऑल इंडिया अभ्यर्थियों के लिए सीटें खोलते हैं, तो उत्तर प्रदेश में ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं अपनाई जा सकती?
छात्रों की मांग क्या है?
उत्तर प्रदेश के छात्र किसी भी राज्य के अभ्यर्थियों का विरोध नहीं कर रहे हैं। उनकी मांग केवल इतनी है कि—
- पहले और दूसरे राउंड में उत्तर प्रदेश के डोमिसाइल छात्रों को प्राथमिकता दी जाए।
- यदि सीटें खाली रह जाती हैं, तो तीसरे राउंड से उन्हें सभी राज्यों के छात्रों के लिए खोला जाए, जैसा कि कई अन्य राज्यों में किया जाता है।
- इससे उत्तर प्रदेश के छात्रों को अपने राज्य में उचित अवसर मिलेगा और खाली सीटें भी नहीं रहेंगी।
सरकार और विपक्ष से सवाल
- क्या उत्तर प्रदेश सरकार इस व्यवस्था की समीक्षा करेगी?
- क्या विधानसभा में इस विषय पर चर्चा होगी?
- क्या सभी राजनीतिक दल लाखों छात्रों के भविष्य से जुड़े इस मुद्दे पर एकजुट होकर आवाज उठाएंगे?
- क्या उत्तर प्रदेश भी अन्य राज्यों की तरह संतुलित और समान अवसर वाली प्रवेश नीति अपनाएगा?
यह केवल मेडिकल सीटों का नहीं, बल्कि समान अवसर का प्रश्न है
लाखों छात्र वर्षों की मेहनत के बाद NEET परीक्षा पास करते हैं। ऐसे में यदि उन्हें अपने ही राज्य में उचित अवसर नहीं मिलता, जबकि अन्य राज्यों में स्थानीय छात्रों को पहले प्राथमिकता दी जाती है, तो यह स्वाभाविक रूप से नीति पर बहस का विषय बन जाता है।
What do you feel about this post?
Like
Love
Happy
Haha
Sad
