ब्यूरो रिपोर्ट नई दिल्ली|DTM
नोएडा/नई दिल्ली, बुधवार 9 सितंबर 2026: गौतमबुद्ध नगर (नोएडा) पुलिस और प्रशासन को पिछले कुछ दिनों में दो अलग-अलग मामलों में अदालतों से कड़ी फटकार झेलनी पड़ी है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक सामाजिक कार्यकर्ता पर लगाए गए राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) को रद्द करते हुए जिलाधिकारी समेत अधिकारियों के वेतन से मुआवजा वसूलने का आदेश दिया, जबकि सुप्रीम कोर्ट ने एक छात्र को जारी किए गए नोटिस पर कार्यपालक मजिस्ट्रेट की कार्रवाई पर नाराजगी जताई।
आकृति चौधरी का NSA मामला
दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा और सामाजिक कार्यकर्ता आकृति चौधरी पर अप्रैल 2026 में नोएडा में हुए मजदूर आंदोलन के दौरान NSA के तहत हिरासत का आदेश जारी किया गया था। गौतमबुद्ध नगर की जिलाधिकारी मेधा रूपम ने यह आदेश पारित किया था। आकृति को करीब पांच महीने तक हिरासत में रखा गया।
इलाहाबाद हाईकोर्ट की खंडपीठ (जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव) ने 2 सितंबर को NSA हिरासत को रद्द कर दिया। विस्तृत आदेश में कोर्ट ने कहा कि हिरासत के आदेश में पर्याप्त सामग्री और सबूत नहीं थे। कोर्ट ने इसे “बिना दिमाग लगाए” पारित आदेश करार दिया।
कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसे अधिकारी यूपी को “ऑरवेलियन डिस्टोपिया” में बदल सकते हैं। जिलाधिकारी को संविधान की शपथ का उल्लंघन करने का दोषी ठहराया गया। अदालत ने आकृति को 5 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया और निर्देश दिया कि यह राशि SHO से लेकर जिलाधिकारी तक सभी जिम्मेदार अधिकारियों के वेतन से वसूली जाए।
आकृति के खिलाफ मजदूर आंदोलन से जुड़े कई मामले दर्ज हैं। कुछ मामलों में उन्हें जमानत मिल चुकी है, जबकि कुछ में कार्यवाही जारी है।
अक्षत त्रिपाठी को जारी नोटिस
दूसरे मामले में गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय के छात्र अक्षत त्रिपाठी को 4 सितंबर को ग्रेटर नोएडा के कार्यपालक मजिस्ट्रेट की ओर से भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 130 के तहत नोटिस जारी किया गया। नोटिस में उनसे 5 लाख रुपये का निजी मुचलका और समान राशि की दो जमानतें भरने को कहा गया था। आरोप था कि उन्होंने जुलाई में दिल्ली के जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रदर्शन में शामिल होने और छात्रों को उकसाने का काम किया।
यह नोटिस सुप्रीम कोर्ट के 1 सितंबर के उस आदेश के बाद जारी किया गया, जिसमें CJP प्रदर्शन से जुड़े कई FIR रद्द किए गए थे और छात्रों के खिलाफ जबरदस्ती कार्रवाई पर रोक लगाई गई थी।
पुलिस ने बाद में नोटिस वापस ले लिया।
9 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर सुनवाई करते हुए नाराजगी जताई। मुख्य न्यायाधीश ने सवाल किया कि मजिस्ट्रेट ने अदालत के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद नोटिस जारी करने की हिम्मत कैसे की। अदालत ने इसे संभावित अवमानना का मामला बताया और अधिकारियों पर टिप्पणी की।
प्रशासन की जवाबदेही पर सवाल
दोनों मामलों में अदालतों ने प्रशासन और पुलिस की कार्रवाई को पर्याप्त आधार के अभाव में मनमाना बताया है। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि निवारक कानूनों और मुचलका नोटिस का इस्तेमाल सावधानी से किया जाना चाहिए। अदालतों के इन फैसलों से अधिकारी जवाबदेही का संदेश स्पष्ट है।
नोएडा पुलिस और जिला प्रशासन की ओर से अभी तक विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
What do you feel about this post?
Like
Love
Happy
Haha
Sad
